Friday, September 23, 2016

शान्ति ... मुंशी प्रेमचन्द की कहानी



शान्ति

जब मै ससुराल आयी, तो बिलकुल फूहड थी। न पहनने-ओढ़ने को सलीका , न बातचीत करने का ढंग। सिर उठाकर किसी से बातचित न कर सकती थीं। ऑंखें अपने आप झपक जाती थीं। किसी के सामने जाते शर्म आती, स्त्रियों तक के सामने बिना घूँघट के झिझक होती थी। मैं कुछ हिन्दी पढ़ी हुई थी;  पर उपन्यास, नाटक आदि के पढ़ने में आन्नद न आता था। फुर्सत मिलने पर रामायण पढ़ती। उसमें मेरा मन बहुत लगता था। मै उसे मनुष्य-कृत नहीं समझती थी। मुझे पूरा-पूरा विश्वास था कि उसे किसी देवता ने स्वयं रचा होगा। मै मनुष्यों को इतना बुद्धिमान और सहृदय नहीं समझती थी। मै दिन भर घर का कोई न कोई काम करती रहती। और कोई काम न रहता तो चर्खे पर सूत कातती। अपनी बूढ़ी सास से थर-थर कॉँपती थी। एक दिन दाल में नमक अधिक हो गया। ससुर जी ने भोजन के समय सिर्फ इतना ही कहा—‘नमक जरा अंदाज से डाला करो।इतना सुनते ही हृदय कॉँपने लगा। मानो मुझे इससे अधिक कोई वेदना नहीं पहुचाई जा सकती थी।

खतरा .. रूपसिंह चंदेल की कहानी



खतरा
 

बंबे (नहर) के पुल से उतरते ही पगडंडी पर आ गया। परिचित टेढ़ी-मेढ़ी, केंचुल चढ़ी सर्पिणी-सी, रज्जू पासी के बाग और राजाराम,गुलाब सिंह के खेतों की मेड़ों से गुजरती वह पगडंडी गड़हा नाला पार कर हिरनगाँव स्टेशन तक जाती थी। स्टेशन बंबे से बमुश्किल एक मील था।

पगडंडी पर उतरने से पहले कुछ देर पुल पर खड़ा सोचता रहा था, ‘पगडंडी से जाना ठीक होगा या सड़क के रास्ते।खतरा दोनो ही ओर हो सकता था। वहकब कहाँ टकरा जाए, कहना कठिन था। पुल के नीचे बंबा जहाँ विराम लेता था, तीन आदमी फावड़ों से कुचिला मिट्टी इकट्ठा कर रहे थे। पगडंडी से कुछ हटकर बैलगाड़ी खड़ी थी। नहर में पानी नहीं था और सड़ी मछलियों और कूड़े की गंध से नथुने फटने लगे थे। सोचा, उन लोगों से पूछ लेना चाहिए... कोई गया तो नहीं पगडंडी के रास्ते, लेकिन मैं अपने को कमजोर नहीं दिखाना चाहता था। चुप रहा।

Thursday, September 22, 2016

कुश्ती .. योगेंद्र आहूजा



कुश्ती

शाम हो चुकी थी जब वे वहाँ पहुँचे । वहाँ लकड़ी का एक टूटा फूटा, जर्जर गेट था, जिसके परे एक छोटा घास का मैदान और उपर ''गुरु सदानंद व्यायामशाला'' का टीन का पुराना, जंग खाया साइन बोर्ड जिसके अक्षर मिट चले थे । बोर्ड पर भव्य, फौलादी देह में एक बलिष्ठ पहलवान की तस्वीर बनी थी, वह भी धुँधली पड़ गयी थी । वे मैदान में बिखरी पत्तियों को पैरों से दबाते हुए अखाड़े की नम, मूक मिट्टी के पास खड़े हो गये । उन दोनों में से जो उम्रदराज था, गुरु सदानंद, उसने अखाड़े के कोने में स्थापित बजरंगबली की छोटी सी मूर्ति को प्रणाम किया ।

पिताजी का समय .. स्वयं प्रकाश की कहानी



पिताजी का समय

अपने घर में मैं परम स्वतंत्र था। जैसे चाहे रहता, जो चाहे करता। मर्जी आती जहाँ जूते फेंक देता, मन करता जहाँ कपड़े। जगह-जगह मेरी किताबें बिखरी रहतीं और लगभग हर कमरे में मेरी चीजें। कभी अचानक कहीं जाना होता तो मुझसे उस घर में मेरी कोई चीज नहीं ढूँढ़ी जाती। हर चीज माँ मुझे ढूँढ़कर देती। मेरे जाने के बाद वह सारे घर से मेरी किताबें-कॉपियाँ, कपड़े, जूते, चप्पल, खिलौने समेट कर मेरे कमरे में रखती। लेकिन मेरे कमरे में भी किसी चीज की कोई निश्चित जगह नहीं होती। कमीज तकिए के नीचे तो किताब पलंग के पीछे। मोजे संदूक के नीचे तो घड़ी बाथरूम की शेल्फ पर। माँ ही मेरे कमरे की सफाई भी करती। इतने घनघोर में वह सफाई पता नहीं किस तरकीब से करती। मेरे लिए तो यह असंभव ही होता।

उसने कहा था .. चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी'



उसने कहा था 
बड़े-बडे़ शहरों के इक्के-गाडी वालों की जबान के कोड़ों से जिनकी पीठ छिल गई है और कान पक गए हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बम्बू कार्ट वालों की बोली का मरहम लगावे। जबकि बड़े शहरों की चौड़ी सड़को पर घोड़े की पीठ को चाबुक से धुनते हुए इक्के वाले कभी घोड़े की नानी से अपना निकट यौन-संबंध स्थिर करते हैं, कभी उसके गुप्त गुह्य अंगो से डाक्टर को लजाने वाला परिचय दिखाते हैं, कभी राह चलते पैदलों की आँखो के न होने पर तरस खाते हैं, कभी उनके पैरो की अंगुलियों के पोरों की चींथकर अपने ही को सताया हुआ बताते हैं और संसार भर की ग्लानि और क्षोभ के अवतार बने नाक की सीध चले जाते हैं, तब अमृतसर में उनकी बिरादरी वाले तंग चक्करदार गलियों मे हर एक लडढी वाले के लिए ठहर कर सब्र का समुद्र उमड़ा कर-- बचो खालसाजी, हटो भाईज', ठहरना भाई, आने दो लालाजी, हटो बाछा कहते हुए सफेद फेटों , खच्चरों और बतको, गन्ने और खोमचे और भारे वालों के जंगल से राह खेते हैं ।

माता का ह्रदय .. मुंशी प्रेमचन्द की कहानी



माता का ह्रदय

माधवी की आंखों में सारा संसार अंधेरा हो रहा था । काई अपना मददगार दिखाई न देता था। कहीं आशा की झलक न थी। उस निर्धन घर में वह अकेली पडी रोती थी और कोई आंसू पोंछने वाला न था। उसके पति को मरे हुए २२ वर्ष हो गए थे। घर में कोई सम्पत्ति न थी। उसने न- जाने किन तकलीफों से अपने बच्चे को पाल-पोस कर बडा किया था। वही जवान बेटा आज उसकी गोद से छीन लिया गया था और छीनने वाले कौन थे ? अगर मृत्यु ने छीना होता तो वह सब्र कर लेती। मौत से किसी को द्वेष नहीं होता। मगर स्वार्थियों के हाथों यह अत्याचार असहृ हो रहा था। इस घोर संताप की दशा में उसका जी रह-रह कर इतना विफल हो जाता कि इसी समय चलूं और उस अत्याचारी से इसका बदला लूं जिसने उस पर निष्ठुर आघात किया है। मारूं या मर जाऊं। दोनों ही में संतोष हो जाएगा।

Monday, September 19, 2016

अँधेरे में .. गजानन माधव मुक्तिबोध




 अँधेरे में

 एक रात को बारह बजे, ट्रेन से एक युवक उतरा। स्टेशन पर लोग एक कतार में खड़े थे और ज्‍यादा नहीं थे। इसलिए ट्रेन से नीचे आने में उसको ज्‍यादा कठिनाई नहीं हुई। स्‍टेशन पर बिजली की रोशनी थी; परंतु वह रात के अँधियारे को चीर न सकती थी, और इसलिए मानो रात अपने सघन रेशमी अँधियारे से तंबूनुमा घर हो गई थी, जिसमें बिजली के दीये जलते हों। उतरते ही युवक को प्‍लेटफॉर्म की परिचित गंध ने, जिसमें गरम धुआँ और ठंडी हवा के झोंके, गरम चाय की बास और पोर्टरों के काले लोहे में बंद मोटे काँचों से सुरक्षित पीली ज्‍वालाओं के कंदीले पर से आती हुई अजीब उग्र बास, इत्‍यादि सारी परिचित ध्‍वनियाँ और गंध थे, उसकी संज्ञा से भेंट की। युवक के हृदय में जैसे एक दरवाजा खुल गया था, एक ध्‍वनि के साथ और मानो वह ध्‍वनि कह रही थी - आ गया, अपना आ गया

खोया हुआ मोती ... रविन्द्रनाथ टैगोर की कहानियाँ


खोया हुआ मोती

मेरी नौका ने स्नान-घाट की टूटी-फूटी सीढ़ियों के समीप लंगर डाला। सूर्यास्त हो चुका था। नाविक नौका के तख्ते पर ही मगरिब (सूर्यास्त) की नमाज अदा करने लगा। प्रत्येक सजदे के पश्चात् उसकी काली छाया सिंदूरी आकाश के नीचे एक चमक के समान खिंच जाती।
नदी के किनारे एक जीर्ण-शीर्ण इमारत खड़ी थी, जिसका छज्जा इस प्रकार झुका हुआ था कि उसके गिर पड़ने की हर घड़ी भारी शंका रहती थी। उसके द्वारों और खिड़कियों के किवाड़ बहुत पुराने और ढीले हो चुके थे। चहुं ओर शून्यता छाई हुई थी। उस शून्य वातावरण में सहसा एक मनुष्य की आवाज मेरे कानों में सुनाई पड़ी और मैं कांप उठा।
''आप कहां से आ रहे हैं?''

कठपुतलियाँ .. मनीषा कुलश्रेष्ठ की कहानी



कठपुतलियाँ



सुगना जब-जब कोठरी के अंदर-बाहर जाती, दरवाज़े के पीछे लटकी कठपुतलियां उससे टकरा जातीं... उसे रोकतीं अपनी कजरारी, तीखी, फटी-फटी आंखों से, चमाचम गोटे के लहंगों वाली रानियां, नर्तकियां और अंगरखे-साफे वाले, आंके-बांके, राजा-महाराजा और घोड़े पर सवार सेनापति। ढोलकी वाला विदूषक और सारंगी वाली उसकी साथिन। दीवाना मजनूं और नकाब वाली उसकी लैला। कभी सुगना उदास होती तो इन कठपुतलियों का एक साथ ढेर बनाकर ताक पर रख देती और सांकल लगाकर गुदड़ी पर ढह जाती। कभी गुस्सा होती तो ज़ोर से झिंझोड़ देती सबके धागे। कुछ मटक जातीं, एक दूसरे में अटक जातीं। किसी नर्तकी की गर्दन उसी के हाथों में उलझ जाती। कोई राजा डोर से टूट मुंह के बल गिरा होता। ढीठ मालिन टोकरी समेत उसके ऊपर। प्यार आता तो उनके धागे सुलझाती, टूटे जेवर ठीक करती, उधड़े गोटे-झालर सींती या नए कपड़े बनाती।

मोटेराम जी शास्त्री ... मुंशी प्रेमचन्द की कहानी



मोटेराम जी शास्त्री

पण्डित मोटेरा जी शास्त्री को कौन नही जानता! आप अधिकारियों का रूख देखकर काम करते है। स्वदेशी आन्दोलने के दिनों मे अपने उस आन्दोलन का खूब विरोध किया था। स्वराज्य आन्दोलन के दिनों मे भी अपने अधिकारियों से राजभक्ति की सनद हासिल की थी। मगर जब इतनी उछल-कूद पर  उनकी तकदीर की मीठी नींद न टूटी, और अध्यापन कार्य से पिण्ड न छूटा, तो अन्त मे अपनी एक नई तदबीर सोची। घर जाकर धर्मपत्नी जी से बोलेइन बूढ़े तोतों को रटाते-रटातें मेरी खोपड़ी पच्ची हुई जाती है। इतने दिनों विद्या-दान देने का क्याफल मिला जो और आगे कुछ मिलने की आशा करूं।
    

कतार से कटा घर ...अनिल प्रभा कुमार की कहानी



कतार से कटा घर

स्कूल की बस सड़क के किनारे रुकी तो हम तीनो बस्ते सँभाल कर खड़े हो गए। बस ड्राइवर ने बटन दबाया और एक तीन फुट की लंबी-सी लाल पट्टी खिच कर बाहर निकल आई जैसे किसी ट्रैफिक-पुलिस वाले की बाँह हो। उसके सिरे पर लाल अष्टकोण सा हाथ, जिस पर सफेद अक्षरों से लिखा था - स्टॉप। दोनों तरफ की कारें जहाँ की तहाँ रुक गईं - बच्चे उतर रहे हैं। रुकना कानून है। ड्राइवर ने बस का दरवाजा खोल दिया। स्कॉट और अनीश मुझसे पहले उतरकर, पीठ पर बस्ता झुलाते, गप्पें मारते जा रहे थे और मैं उनके पीछे चुपचाप चलता गया। वह ऐसे चलते हैं जैसे मैं हूँ ही नहीं।

जहर और दवा ... अभिमन्यु अनत की कहानी



 जहर और दवा

जब मैंने पिता को यह कहते सुना कि सोफिया हमारे यहाँ आकर घर के कामों को सँभाल लेगी, उस समय मुझे हैरानी तो तनिक भी नहीं हुई, लेकिन मैं उस बात पर काफी देर तक सोचता ही रह गया था। मेरी माँ को अस्पताल में दाखिल हुए आज तीसरा दिन था। उससे दो दिन पहले से ही मेरी बहन चचेरी बहनों के साथ समुद्र किनारे बँगले पर सर्दी की छुट्टियाँ बिता रही थी। हमारे घर के कामों को सँभालने के लिए किसी व्यक्ति की जरूरत थी, इस बात को मैं पिता से अधिक समझता था। शहर में जहाँ हम रहते हैं, नौकरानियों की कमी नहीं थी, फिर भी सोफिया हमारे घर आ रही थी, इस बात से, जैसे कि मैं ऊपर कह आया हूँ, मुझे आश्चर्य नहीं हुआ। इस प्रश्न को गौर से सोचते हुए मैं यह मान लेने को विवश था कि मेरे पिता को यह गवारा नहीं कि हाथ आया मौका यों ही चला जाए।

Sunday, September 18, 2016

मिठाईवाला ... भगवतीप्रसाद वाजपेयी



मिठाईवाला


बहुत ही मीठे स्वरों के साथ वह गलियों में घूमता हुआ कहता - "बच्चों को बहलानेवाला, खिलौनेवाला।"
इस अधूरे वाक्य को वह ऐसे विचित्र किन्तु मादक-मधुर ढंग से गाकर कहता कि सुननेवाले एक बार अस्थिर हो उठते। उनके स्नेहाभिषिक्त कंठ से फूटा हुआ उपयुक्त गान सुनकर निकट के मकानों में हलचल मच जाती। छोटे-छोटे बच्चों को अपनी गोद में लिए युवतियाँ चिकों को उठाकर छज्जों पर नीचे झाँकने लगतीं। गलियों और उनके अन्तर्व्यापी छोटे-छोटे उद्यानों में खेलते और इठलाते हुए बच्चों का झुंड उसे घेर लेता और तब वह खिलौनेवाला वहीं बैठकर खिलौने की पेटी खोल देता।

तांगे वाले की बड़ .. मुंशी प्रेमचन्द की कहानी



तांगे वाले की बड़


लेखक को इलाहाबाद मे एक बार ताँगे मे लम्बा सफर करने का संयोग हुआ। तांगे वाले मियां जम्मन बड़े बातूनी थे। उनकी उम्र पचास के करीब थी, उनकी बड़ से रास्ता इस आसानी से तस हुआ कि कुछ मालूम ही न हुआ। मै पाठकों के मनोरंजन के लिए उनकी जीवन और बड़ पेश करता हूं।

Saturday, September 17, 2016

छाया ... अज्ञेय की कहानी



छाया 

मैंने बहुत फाँसियाँ देखी हैं उन्हें देखने का आदी-सा हो गया हूँ। जब मेरी ड्यूटी फाँसी पर लगती है, तब मुझे घबराहट नहीं होती, मेरा जी नहीं मिचलता। अपना काम पूरा करता हूँ। और खुशी-खुशी चला आता हूँ, दूसरी बार मुझे उसका ख़याल भी नहीं होता। जैसा कहानियों में होता है, चलते-चलते ठिठक जाऊँ, खाना खाते-खाते चौंककर देखने लगूँ कि हाथों में खून तो नहीं लगा है, सोते-सोते स्वप्न में चिल्ला उठूँ, यह सब मुझे न होता है न कभी हुआ है। हाँ, उस एक फाँसी की याद मेरा भी दिल हिला देती है। इसलिए नहीं कि उसमें कोई खास बात थी। नहीं, वह भी और फाँसियों की तरह एकदम मामूली फाँसी थी... पर उसके पहले और बाद की एक-दो घटनाएँ ऐसी थीं, और वह क़ैदी जो उस दिन फाँसी देखने के लिए भेजा गया था, उसके मुँह के भाव शायद और फाँसियों की तरह मैं उस फाँसी को भूल जाता, लेकिन उस कैदी की याद एकदम फाँसी की याद दिला देती है... कैदी की फाँसी की और उन एक-दो घटनाओं की कहानी एक-दूसरे से ऐसी जुड़ी हुई है कि एक का ध्यान आते ही सारी कहानियाँ आँखों के सामने फिर जाती हैं -और उस लड़की के पत्र की, उस बेंत लगने के नज़ारे की, और उस क़ैदी के गाने की याद मेरे आगे नाच उठती हैः

डाकमुंशी .. भुवनेश्वर की कहानी



डाकमुंशी

 कठिन पथ पर चले हुए श्रमित यात्रियों के समान एक इमली की सघन छाया में, जहाँ दो सड़कें मिली थीं, वहाँ वह कब से बैठता था, यह बतलाना कठिन है। कहानियों की भाषा में उसे अनन्त कालकहा जा सकता है; पर उसके चारों ओर एक ऐसा प्रचुर विश्राम था कि उसे देखकर ही सारी कल्पना जड़ हो जाती थी। जैसे - वह तरल कल्पना के अन्तिम बिन्दु पर पहुँचकर उसका एक दृढ़ और कटु उपहास कर रहा हो।

जिंदगी यहाँ और वहाँ .. निर्मल वर्मा की कहानी



जिंदगी यहाँ और वहाँ

और तब फोन की घंटी बजी और वह समझ गया, यह वह है - वह भागता हुआ मेज के पास आया, ‘हलो,’ उसने कहा, ‘यह मैं हूँ।दूसरी तरफ सन्नाटा रहा, ‘हलो,’ जैसे वह उसकी सहमी, ठिठुरती आवाज सुन रही हो। हलो, हलो,’ उसने थूक निगल कर कहा, ‘कौन है? आप कौन हैं?’

उसने फोन के ऊपर देखा। खाली दीवार, जनवरी का महीना, एक खिड़की, जिसका पर्दा उठ गया था। मैं दस तक गिनती गिनूँगा, उसने सोचा, इस बीच कुछ नहीं बोलूँगा, वह फोन बंद कर देगी और खतरा टल जाएगा। हुआ भी यही-दूसरी तरफ सन्नाटा हो गया - और वह गिनने लगा - पर दूसरे ही क्षण उसका स्वर सुनाई दिया, घबराया-सा, नर्वस, फोन के काले सन्नाटे को भेदता हुआ, ‘फैटी, तुम सुन रहे हो? तुम बोलते क्यों नहीं? यह तुम क्या बुड़बुड़ा रहे हो... मैं सुन भी नहीं सकती।

मैकू .. मुंशी प्रेमचन्द की कहानी



मैकू

कादिर और मैकू ताड़ीखाने के सामने पहूँचे , तो वहॉँ कॉँग्रेस के वालंटियर झंडा लिए खड़े नजर आये। दरवाजे के इधर-उधर हजारों दर्शक खड़े थे। शाम का वक्त था। इस वक्त गली में पियक्कड़ों के सिवा और कोई न आता था। भले आदमी इधर से निकलते झिझकते। पियक्कड़ों की छोटी-छोटी टोलियॉँ आती-जाती रहती थीं। दो-चार वेश्याऍं दूकान के सामने खड़ी नजर आती थीं। आज यह भीड़-भाड़ देख कर मैकू ने कहाबड़ी भीड़ है बे, कोई दो-तीन सौ आदमी होंगे।
    

Friday, September 16, 2016

गड़रिया...अशफाक अहमद की कहानी



गड़रिया

सर्दी की एक अँधेरी रात की बात है मैं अपने गर्म बिस्तर पर सर ढके गहरी नींद सो रहा था कि किसी ने जोर से झंझोड़कर जगा दिया।
''कौन है?'' मैंने चीखकर पूछा और उत्तर में एक बड़ा-सा हाथ मेरे सर से टकराया और घोर अंधेरे से आवांज आयी''थानेवालों ने रानो को गिरंफ्तार कर लिया।''
''क्या?'' मैंने कांपते हाथ को परे ढकेलना चाहा, ''क्या है?'' और अंधेरे का भूत बोला''थानेवालों ने रानो को पकड़ लिया इसका फारसी में अनुवाद करो।''

खंडित स्वप्न...रूपसिंह चंदेल की कहानी



खंडित स्वप्न
 
कॉलेज में आज भी मीटिंग देर से समाप्त हुई। जब वे घर पहुँची,साढ़े जीन बज रहे थे। दरवाजा खोलते ही नौकरानी पूछ बैठी, ‘बीबीजी,आज फिर देर कर दी...लेकिन उसकी बात का उत्तर दिए बिना उससे जल्दी खाना लगा देने के लिए कहकर बिना कपड़े बदले ही वह बाथरूम चली गयीं और जब बाहर निकलीं, उनके चेहरे से दिन भर की थकान के चिह्न मिट चुके थे।