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Sunday, October 23, 2016

आदमी के बारे में सोचते लोग..बलराम अग्रवाल की कहानी



आदमी के बारे में सोचते लोग


यार लोग तीन-तीन पैग गले से नीचे उतार चुके थे। यों शुरू से ही वे चुप बैठे हों, ऐसा नहीं था, लेकिन तब उनकी बातों का केंद्र बोतल में कैद लाल परी थी, सिर्फ लाल परी। उसे पेट में उतार लेने के बाद उन्हें लगा कि पीने-पिलाने को ले कर हुई सारी बातें और बहसें बहुत छोटे और ओछे लोगों जैसी थीं। अब कुछ बातें बड़े और ऊँचे दर्जे के दार्शनिकों जैसी की जानी चाहिए।

Sunday, September 11, 2016

खुले पंजोंवाली चील .. बलराम अग्रवाल की कहानी




खुले पंजोंवाली चील  

दोनों आमने-सामने बैठे थे - काले शीशों का परदा आँखों पर डाले बूढ़ा और मुँह में सिगार दबाए, होठों के दाएँ खखोड़ से फुक-फुक धुँआ फेंकता फ्रेंचकट युवा। चेहरे पर अगर सफेद दाढ़ी चस्पाँ कर दी जाती और चश्मे के एक शीशे को हरा पोत दिया जाता तो बूढ़ा 'अलीबाबा और चालीस चोर' का सरदार नजर आता। और फ्रेंचकट? लंबोतरे चेहरे और खिंची हुई भवों के कारण वह चंगेजी मूल का लगता था।