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Tuesday, October 4, 2016

अकाल मृत्यु..स्वयं प्रकाश की कहानी



अकाल मृत्यु

बात तब की है जब मैं नवीं कक्षा में पढ़ता था। हमारी कक्षा में अमृतलाल नाम का एक लड़का था। प्यार से सब उसे 'इम्मी' कहते थे। इम्मी फुटबॉल का बहुत अच्छा खिलाड़ी था। वह न सिर्फ स्कूल की फुटबॉल टीम में था बल्कि संभाग की टीम में भी खेल चुका था। उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। कई बार वह समय पर फीस जमा नहीं करवा पाता था और उसे अक्सर अपनी फीस माफ करवाने के लिए इस-उस के पीछे घूमते देखा जा सकता था। उससे कहा गया था कि जिस दिन उसका चयन राज्यस्तरीय टीम में हो जाएगा, उसकी फीस माफ कर दी जाएगी। नतीजा यह कि स्कूल के बाद अँधेरा होने तक वह स्कूल के मैदान पर फुटबॉल खेलता रहता - चाहे अकेला ही, या दौड़ते हुए मैदान के चक्कर लगाता रहता।

Thursday, September 22, 2016

पिताजी का समय .. स्वयं प्रकाश की कहानी



पिताजी का समय

अपने घर में मैं परम स्वतंत्र था। जैसे चाहे रहता, जो चाहे करता। मर्जी आती जहाँ जूते फेंक देता, मन करता जहाँ कपड़े। जगह-जगह मेरी किताबें बिखरी रहतीं और लगभग हर कमरे में मेरी चीजें। कभी अचानक कहीं जाना होता तो मुझसे उस घर में मेरी कोई चीज नहीं ढूँढ़ी जाती। हर चीज माँ मुझे ढूँढ़कर देती। मेरे जाने के बाद वह सारे घर से मेरी किताबें-कॉपियाँ, कपड़े, जूते, चप्पल, खिलौने समेट कर मेरे कमरे में रखती। लेकिन मेरे कमरे में भी किसी चीज की कोई निश्चित जगह नहीं होती। कमीज तकिए के नीचे तो किताब पलंग के पीछे। मोजे संदूक के नीचे तो घड़ी बाथरूम की शेल्फ पर। माँ ही मेरे कमरे की सफाई भी करती। इतने घनघोर में वह सफाई पता नहीं किस तरकीब से करती। मेरे लिए तो यह असंभव ही होता।

Monday, September 12, 2016

चौथा हादसा... स्वयं प्रकाश की कहानी



स्वयं प्रकाश की कहानी

चौथा हादसा

मेरा तबादला जैसलमेर हो गया था और वहाँ की फिजा में ऐसा धीरज, इतनी उदासी, ऐसा इत्मीनान, इस कदर अनमनापन, ऐसा 'नेचा' है कि सोचा अजीब माहौल है यार, चलो ऐसा कुछ करें जैसा और जगह नहीं कर सकते। मसलन किसी दिन लुंगी पहन कर दफ्तर चले जायें, या गले में ढेर सारी मालाएँ पहन लें और लोगों के हाथ देखने लगें या दिनदहाड़े छत पर खड़े हो कर नंगे नहाएँ! एक अपेक्षाकृत बड़ी जगह से इस छोटी जगह आया था इसलिए जरा ज्यादा ही मस्ती लग रही थी। और यह मस्ती वहाँ की हर चीज में थी। लोग आराम से उठते, चाय पीने से पहले आधा घंटा खाली बैठते, अखबार दो घंटे में पढ़ते, दफ्तर के लिए तैयार होने में एक घंटा लगाते, रास्ते में कोई मिल जाता तो हाथ मिलाने के दो-दिन मिनट बाद बात शुरू करते - कहिए क्या हाल है? और आप पहले पूछे लें कि क्या हाल है तो डेढ़ मिनट रुक कर, जैसे काफी सोच कर जवाब देते कि बस ठीक-ठाक है! किसी को कहीं जाने की जल्दी नहीं थी। दिन था, जो घटनाविहीन-सा था, रातें थीं, जिनमें कोई लंबे-चौड़े सपने नहीं थे, रिश्तेदारियाँ थीं, जो बहुत सीमित थीं। पैंसठ की लड़ाई और फैमीन के किस्से थे जो बीसियों बार सुन-सुनाए जा चुके थे। बच्चे थे, जो अपने आप आहिस्ता-आहिस्ता बड़े हो रहे थे। और एक सूनी-सपाट-निष्प्रयोजन-अलस जिंदगी थी जो धीरे-धीरे रेंग रही थी।