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Saturday, October 15, 2016
Tuesday, October 4, 2016
फुर्सत..मो. आरिफ की कहानी
फुर्सत
दिल ढूँढ़ता है
फिर वही फुर्सत के रात-दिन।
बैठे रहे
तसव्वुरे-जानाँ किए हुए
- गालिब
पिछले छह दिन
काफी व्यस्त गुजरे थे। काफी दबावभरे और भारी। इसके पहले वाले छह दिन भी कुछ कम
कहाँ रहे थे। उसके पहले वाला हफ्ता शायद अच्छा गया था। ऑफिस से लेकर घर तक ऊपर
वाले की कृपा रही थी। महीने में चार हफ्ते होते हैं तो एकाध हफ्ता ठीक-ठाक भी मिल
जाता था। याद नहीं है कब से ये हफ्तेवार जिंदगी जी रहा हूँ। जब हफ्तों में नहीं
बँटा था तो तरसता था। वक्त इफरात था तो पढ़ने-घूमने-खेलने में मन नहीं रमता था।
किसी तरह कहीं हाथ-पैर से लग जाएँ, हर वक्त यही सोचा
करते थे। नौकरी से लगे तो धीरे-धीरे सारी किल्लतें और जिल्लतें खत्म हो गयीं पर
किसी बड़ी ही खूबसूरत और कीमती चीज से महरूम भी होने लगे - बूँद-बूदँ।
Sunday, September 25, 2016
चोर सिपाही .. मो. आरिफ की कहानी
चोर सिपाही
पहले डायरी के
बारे में दो शब्द मेरी ओर से, फिर
तारीख-ब-तारीख डायरी। सलीम से जो डायरी मुझे मिली थी उसे मैंने ज्यों की त्यों
नहीं छपवाया। सलीम की ऐसी कोई शर्त भी नहीं थी। पहले तो वह इसे मेरे हवाले ही नहीं
करना चाहता था, क्योंकि उसका
मानना था कि यह डायरी, और देखा जाए तो
कोई भी डायरी, व्यक्तिगत और
गोपनीय दस्तावेज होती है। लेकिन पूरी डायरी देखने के बाद मुझे लगा था कि इस लड़के
की डायरी में ऐसे विवरण हैं... सारे नहीं, कुछेक... जो व्यक्तिगत और गोपनीय का बड़ी आसानी से अतिक्रमण करते हैं। उन्हें
पब्लिक डोमेन में लाना ही मेरी मंशा थी। मैंने उसे समझाया तो वह मान गया। दरअसल वह
पूरी तरह समझा नहीं, बस मान गया। अपना
लिखा हुआ छप रहा है... इस उत्कंठा में उसने डायरी मुझे सौंप दी, यह कहते हुए कि आप लेखक हैं... डायरी में जो
अच्छा लगे छपवा दें, यानी जो हिस्से
लोगों के सामने लाने हैं उन्हें अपनी शैली में, अर्थात एक लेखक की शैली में, एक लेखक की भाषा में, परिवर्तित करके प्रकाशित कर दें। बाकी के हिस्से में तो बस
रोजमर्रा की जिंदगी है, उसके अहमदाबाद
प्रवास की दिनचर्या है। वह भी उन सात आठ दिनों की दिनचर्या जब उसके मामू के
मुहल्ले में कर्फ्यू जैसे हालात थे और वह एक दिन एक घंटे एक पल के लिए भी घर से
बाहर नहीं निकल पाया। घर में पड़े पड़े कोई क्या करेगा। सलीम की डायरी ऐसे माहौल
और मानसिकता में रोज-ब-रोज लिखी गई थी जिसमें बहुत सारे ब्योरे थे। इन इंदिराजों को
पूरा का पूरा लोगों के सामने परोसने का कोई अर्थ नहीं था। मेरी रुचि तो कुछ विशेष
प्रसंगों और संदर्भों में ही थी।
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