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Tuesday, October 18, 2016

दूर है किनारा..अंजू शर्मा की कहानी



दूर है किनारा 
 
तपन ने आसमान की ओर सर उठाकर देखा तो कुछ देर बस देखता ही रहा! आकाश तो वहाँ भी था पर इतना खुला कभी नहीं लगा, खूब खुला, निस्सीम, अनंत! और ये हवा, ये भी तो वहाँ थी पर इतनी आजाद, इतनी खुशनुमा कभी न थी! उसने जोर से सांस खिंची, इतनी जोर से मानो ब्रह्माण्ड की सारी हवा अपने फेफड़ों में भर लेने की ख्वाहिश रखता हो! कैसा हल्का महसूस कर रहा था खुद को, जैसे सदियों से एक बोझ उठाये हुए उसका वजूद थक गया था! कैसी थी यह थकान! बचपन में सुनी थी माँ से कहानी कि पृथ्वी शेषनाग के फन पर टिकी है! आज लगा...ना तो... सब झूठ है... निरा प्रलाप है... पृथ्वी तो उसके कंधों पर टिकी थी! बस अभी तो मुक्त हुआ था वह उसके भार से! और ये सुबह... इस सुबह की प्रतीक्षा में कितनी रातें तपन ने बिना जागे ही काट दी, रातें जो उसकी आँखों में उगी, ढली और सो गईं पर क्या वह कभी सुकून का एक लम्हा जी पाया था!

Wednesday, October 12, 2016

बंद खिड़की खुल गयी..अंजू शर्मा की कहानी



बंद खिड़की खुल गयी
उस रोज़ सूरज ने दिन को अलविदा कहा और निकल पड़ा बेफिक्री की राह पर! इधर वह बड़ी तेज़ी से भाग रही थी, इस उम्मीद में कि इस सड़क पर हर अगला कदम उसके घर की दहलीज़ के कुछ और करीब ले जाएगा! तेज़ बहुत तेज़, मानो उसके पांवों में मानों रेसिंग स्केट्स बंधे हों! पर आज लग रहा था, हर कदम पर घर कुछ और दूर हो जाता है! वह कौन थी? शर्लिन, शालिनी, सलमा या सोहनी। नाम कुछ भी हो, अकस्मात आ टपकी आपदाओं को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वे हमेशा सॉफ्ट टारगेट ढूंढ ही लेती हैं! तो उस बदहवास हालत में कहाँ पाँव पड़ रहे थे, उसे होश नहीं था। हाथ का बैग कब, कहाँ गिर गया था, उसे याद नहीं। उस मीठे जाड़े वाले सर्द मौसम एक शाल को अपने जिस्म पर कसे वह दौड़ती जा रही थी।

Saturday, September 10, 2016

गली नंबर दो ...अंजू शर्मा की कहानी

गली नंबर दो

"पुत्तर छेत्ती कर, वेख, चा ठंडी होंदी पई ए।"

बीजी की तेज आवाज से उसकी तंद्र भंग हुई। रंग में ब्रश डुबोते हाथ थम गए। पिछले एक घंटे में यह पहला मौका था, जब भूपी ने मूर्ति, रंग और ब्रश के अलावा कही नजर डाली थी। चाय सचमुच ठंडी हो चली थी। उसने एक साँस में चाय गले से नीचे उतारते हुए मूर्तियों पर एक भरपूर नजर डाली। दीवाली से पहले उसे तीन आर्डर पूरे करने थे। लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियों से घिरा भूपी दूर बिजली के तार पर अठखेलियाँ करते पक्षियों को देखने लगा। हमेशा की तरह आज भी एक आवारा-सा ख्याल सोच के वृक्ष की फुनगी पर पैर जमाने लगा, आखिरकार ये पक्षी इतनी ऊँचाई पर क्यों बैठे रहते हैं? 'ऊँचाई' दुनिया का सबसे मनहूस शब्द था और ऊँचाइयाँ उसे हमेशा डर की एक ऐसी परछाई में ला खड़ा करती थी कि जिसके आगे उसका व्यक्तित्व छोटा, बहुत छोटा हो जाता था। दूर आसमान में सिंदूरी रंग फैलने लगा था जिसकी रंगत धीरे-धीरे भूपी के रंगीन हाथों सी होती चली गई।

Saturday, August 27, 2016

छत वाला कमरा और इश्क वाला लव ... अंजू शर्मा

छत वाला कमरा और इश्क वाला लव

ये कमबख्त मन भी ना, कोई किताब होती तो झट से बंद कर रख देती शेल्फ पर, पर मन तो मन है। नहीं होना बंद, नहीं टंगना शेल्फ पर। तो क्या चाहिए इसे? अब कहाँ की सैर पर निकलना चाहता है? कभी-कभी काम में डूबे रहने के बाद आँखें आराम माँगती हैं पर सोने जाओ तो निद्रालोक के द्वार पर बड़ा-सा ताला टँगा मिलता है। ऐसी ही एक रात, यूँ ही अनमने ही, नैना ने फेसबुक पर 'लॉगिन' किया। रात का एक बज चुका था। घरवालों के साथ घर भी नींद के आगोश में डूब चुका है पर ये दिल है कि माँगें मोर। "चैटिंग?" उँह, बोरिंग! "तो...?" बस यूँ ही की-बोर्ड पर खेलते 'होम' पर कुछ खास लगा नहीं नैना को जो मन को राहत मिलने का सबब बनता। काफी दिन से मित्र बनने के लिए ढेरों 'रिक्वेस्ट' पेंडिंग थी। उसने 'फ्रेंड रिवेस्ट' चेक करने के लिए क्लिक किया। दूसरे ही नंबर पर एक नाम से नैना की अर्धसुप्त चेतना को हल्का सा झटका लगा। साँसों के स्पंदन ने इस एक झटके के बाद गति पकड़ ली और तभी जैसे कमरे में कही से इलायची की भीनी-भीनी महक घुलते हुए हौले से उसे छूकर गुजर गई।