दूर है किनारा
तपन ने आसमान की ओर सर
उठाकर देखा तो कुछ देर बस देखता ही रहा! आकाश तो वहाँ भी था पर इतना खुला कभी नहीं
लगा, खूब खुला, निस्सीम, अनंत! और ये हवा, ये भी तो वहाँ थी पर इतनी आजाद, इतनी खुशनुमा कभी न थी! उसने जोर से सांस खिंची, इतनी जोर से मानो ब्रह्माण्ड की सारी हवा अपने फेफड़ों में
भर लेने की ख्वाहिश रखता हो! कैसा हल्का महसूस कर रहा था खुद को, जैसे सदियों से एक बोझ उठाये हुए उसका वजूद थक
गया था! कैसी थी यह थकान! बचपन में सुनी थी माँ से कहानी कि पृथ्वी शेषनाग के फन
पर टिकी है! आज लगा...ना तो... सब झूठ है... निरा प्रलाप है... पृथ्वी तो उसके
कंधों पर टिकी थी! बस अभी तो मुक्त हुआ था वह उसके भार से! और ये सुबह... इस सुबह
की प्रतीक्षा में कितनी रातें तपन ने बिना जागे ही काट दी, रातें जो उसकी आँखों में उगी, ढली और सो गईं पर क्या वह कभी सुकून का एक लम्हा जी पाया
था!


