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Monday, October 17, 2016

खुशकिस्मत..मृदुला गर्ग की कहानी



खुशकिस्मत

 हाथ में दवा का पत्ता थामे, निश्चेष्ट नलिनी सोच रही थी, उससे गलती ठीक कब हुई। अगर यह दवा न खिलाई होती तो क्या नरेंद्र जीवित होता? या आखिरी क्षण अपोलो अस्पताल के डाक्टर से लिया अपॉइंटमेंट रद्द करके वह उसे दूसरे अस्पताल न ले गई होती तो जीवित होता? वहीं के न्यूरोलोजिस्ट ने दवा की मिकदार बढ़ाई थी न? वह सलाह परिवार के परिचित डाक्टर ने दी थी; उन्हीं के दवाखाने से फोन करके अपोलो का अपॉइंटमेंट रद्द करके दूसरे अस्पताल फोन लगाया था। तुरंत समय मिल गया तो ले गई। परिचित डाक्टर पर आस्था थी इसीलिए उनकी सलाह मान कर न?

Tuesday, October 4, 2016

बेंच पर बूढ़े..मृदुला गर्ग की कहानी



बेंच पर बूढ़े

बूढ़े पार्क की बेंच पर बैठें या आई.आई.सी. के लाउंज में, खास फर्क नहीं है, उत्तर-दक्षिण दिल्ली के सरहदी लोदी गार्डन की बेंच पर बैठा, नितिन सोच रहा था। ये भी सेवा निवृत्त हैं, वे भी। सेवा निवृत्त, क्या आनबान वाला शब्द है जैसे बंदा सारी उम्र सेवा करके, अपनी मर्जी से निवृत्त हुआ हो। अंग्रेजी पर्याय "रिटायर" में वह शान नहीं झलकती, बल्कि गाड़ी के "रीट्रीडड टायर" की याद हो आती है। पर शब्द से क्या होता है, अर्थ दोनों का एक है, घर से निष्कासित। जैसे नितिन। कभी नितिन सोलंकी... हाल में सेवा निवृत्त हो मात्र नितिन या वह भी नहीं, केवल पापा या दादा। कितनी चिढ़ है उसे पापा शब्द से। अजब निरर्थक संबोधन है। जैसे गार्डन या पार्क। अरे भई, बगीचा या बाग कहते जबान गलती है क्या? कहो तो उसके पोते-पोती समझें ही नहीं। सब कहते हैं न, बड़े-बड़े हिंदी के विद्वान भी, हिंदी बदलेगी तो चलेगी! यानी अंग्रेजी शब्दों का घालमेल करके बोलो तो लँगड़ा कर चल लेगी कुछ देर और। नितिन की जिंदगी खत्म होने तक, जरूर। ठीक है, वह नाहक अपना भेजा क्यों खराब कर रहा है, खासी बढ़िया अंग्रेजी जानता है। जो नहीं जानते, उद्यान और उपवन में फर्क किए बगैर, किसी भी मैदान को पार्क या गार्डन पुकारते हैं। उसे भी उनकी चाल चलना पड़ता है। सो पेड़-फूलों से लदा इतना बड़ा मैदान हुआ गार्डन और मौहल्लों की नन्हीं-सी खुली जगह हुई पार्क! हुआ करे, वह अपना भेजा फ्राई क्यों कर रहा है? और कुछ फ्राई रहा जो नहीं जिंदगी में। "फ्राई" उसे इस उम्र में चलता नहीं। सच कहें तो खूब चलता है उसे; उसकी बहू मान्या मानती है, नहीं चलना चाहिए। सो रोज घोड़े के खाने लायक भूसा, चलो जई सही, औटा कर धर देती है सामने। कहती है, "ओट्स" हेल्थ फूड है। जरूर होगा। घोड़े खाते हैं, कभी किसी घोड़े को दिल का दौरा पड़ते सुना? स्वाद बदलने को वह हँसोड़ वाक्य सोचता है, कहता नहीं। असल बात कौन नहीं जानता, बाजार से डिब्बा-बंद आता है, घोल घोटने में पाँच क्षण नहीं लगते। जिसे पकाने में मेहनत न लगे, वह बनाने वाले की सेहत के लिए मुफीद हुआ न? पता नहीं यह बेस्वाद खाना सिर्फ बूढ़ों के लिए सही क्यों है? जवानों और बच्चों को चलता है, दुकान से आया पित्जा और फ्राईड प्रौन। कहते हैं, उनके खेलने-खाने के दिन हैं। हाल में सेवा निवृत्त हुए अधेड़ के क्या करने के दिन हैं, बहू और उसकी रसोईदारिन की सेहत बनाने के?

Saturday, September 24, 2016

बाल गुरु .. मृदुला गर्ग की कहानी



बाल गुरु

 लड़का तब चौथी कक्षा में पढ़ता था। इतिहास की क्लास चल रही थी। टीचर बोल रही थी कि बस बोल रही थी। ज्ञानवर्द्धक अच्छी-अच्छी बातें। कम अज कम कयास तो यही लगाया जाता है। सहसा उस पर नजर पड़ी कि झपट ली, "अकबर के पिता का नाम बतलाओ।"

"मुझे नहीं मालूम," उसने कहा।

"क्यों नहीं मालूम? जो मैं कह रही थी, सुन नहीं रहे थे?"

"नहीं।"