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Monday, September 26, 2016

बस पाँच मिनट .. अनिल प्रभा कुमार की कहानी




 बस पाँच मिनट 

वह नाच रही थी। देह जैसे तूलिका। मंच के कैनवास पर कलाकृति उकेरती हुई। देह-यष्टि की भंगिमाएँ, हाथों की मुद्राएँ और आँखों के भाव, सब रंग भर रहे थे कल्पना के इस सुंदर चित्र में। थिरकती जा रही थी वह। पाँव जैसे रंगों के कटोरों को हल्का सा टोहका लगाकर वातावरण में जादुई-सा इंद्र-धनुष रचते। दर्शकों को वह देख नहीं पाती। उन पर अँधेरा और उस पर छेड़खानी करता उजाले का गोला। वह आत्मलीन-सी नाचती रही। देह-आत्मा सब एक। दर्शक भी बँधे थे। मंत्र-बिद्ध या नृत्य-बिद्ध। शायद सौंदर्य-बिद्ध। समय कहीं बहक गया। होश आया तब, जब दोनों हाथ जोड़ वह अभिवादन के लिए झुकी। तालियों की गड़गड़ाहट। वह भीगती रही उस पल में जो उसका था।

Monday, September 19, 2016

कतार से कटा घर ...अनिल प्रभा कुमार की कहानी



कतार से कटा घर

स्कूल की बस सड़क के किनारे रुकी तो हम तीनो बस्ते सँभाल कर खड़े हो गए। बस ड्राइवर ने बटन दबाया और एक तीन फुट की लंबी-सी लाल पट्टी खिच कर बाहर निकल आई जैसे किसी ट्रैफिक-पुलिस वाले की बाँह हो। उसके सिरे पर लाल अष्टकोण सा हाथ, जिस पर सफेद अक्षरों से लिखा था - स्टॉप। दोनों तरफ की कारें जहाँ की तहाँ रुक गईं - बच्चे उतर रहे हैं। रुकना कानून है। ड्राइवर ने बस का दरवाजा खोल दिया। स्कॉट और अनीश मुझसे पहले उतरकर, पीठ पर बस्ता झुलाते, गप्पें मारते जा रहे थे और मैं उनके पीछे चुपचाप चलता गया। वह ऐसे चलते हैं जैसे मैं हूँ ही नहीं।

Wednesday, September 14, 2016

सफेद चादर .. अनिल प्रभा कुमार की कहानी



सफेद चादर  

"बस, अब यह पाइन-ब्रुक वाला रास्ता ले लीजिए। ट्रैफिक-लाइट पर बाएँ, अगली ट्रैफिक-लाइट पर दाएँ, और इसी सड़क पर सीधे चलते जाओ जब तक कि...।"

उनकी व्यस्तता देख कर वह रास्ता बताते-बताते रुक गई। वह बड़ी एकाग्रता से स्टियरिंग सँभाले थे। यूँ तो वह अब स्थानीय सड़क पर ही थे और वक्त था दोपहर दो बजे का। ट्रैफिक ज्यादा ही लगता था और वह भी तेज गति से चलता हुआ। लेन एक ही थी और वह भी तंग सी। विपरीत दिशा से भी उतनी ही तेजी से कारें, ट्रक सभी सिर पर चढ़े आते लग रहे थे। गाड़ी चलाने में ध्यान केंद्रित करने की जरूरत थी।