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Saturday, October 22, 2016

वह चुप हैं ..रूपसिंह चंदेल की कहानी



वह चुप हैं

 वह चुप हैं... बिल्कुल ही चुप।
वैसे कम बोलना उनकी आदत है। यह आदत उन्होंने विकसित की है। कभी वह अधिक बोलते थे जिस पर उन्होंने सप्रयास नियंत्रण पा लिया। वह जानते थे कि कम बोलने के लाख लाभ होते हैं। साथी मुँह ताकते रहते हैं कि वह कुछ बोलें लेकिन वह चुप रहते हैं। दूसरों को सुनते हैं और उनके कहे को अपने अंदर गुनते हैं। अवसरानुकूल कुछ शब्द उच्चरित कर देते हैं... एक-एक शब्द पर बल देते हुए। वह अपने वाक्यों की असंबद्धता की चिन्ता नहीं करते। चिन्ता करते हैं अधिक न बोलने की। अधिक बोलने को अब वह स्वास्थ्य खराब होने के कारणों में से एक मानते हैं। स्वास्थ्य को वह व्यापक अर्थ में लेते हैं,जो शारीरिक ही नहीं सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक... व्यापक संदर्भों से जुड़ता है।

Wednesday, October 19, 2016

सब बकवास ..रूपसिंह चंदेल की कहानी



सब बकवास


हम जब उनके बँगले में पहुँचे, आसमान बिल्कुल साफ था, धूप खिली हुई थी और बँगले में खड़े नीम, आम, अमरूद, अनार-के पेड़ों पर चिड़ियाँ चहचहा रही थीं। बँगले के एक ओर एक कोने में केले के वृक्षों का समूह एक-दूसरे से मुँह जोड़े खड़े थे और उनमें घारें और खिलने को विकल फूल लटक रहे थे। लगभग एक हजार वर्गमीटर में फैले उस बँगले, जी हाँ उन्होंने बँगला ही कहा था और वह था भी, में आगे के आधे भाग में फैला था उनका वह उद्यान।

Friday, September 23, 2016

खतरा .. रूपसिंह चंदेल की कहानी



खतरा
 

बंबे (नहर) के पुल से उतरते ही पगडंडी पर आ गया। परिचित टेढ़ी-मेढ़ी, केंचुल चढ़ी सर्पिणी-सी, रज्जू पासी के बाग और राजाराम,गुलाब सिंह के खेतों की मेड़ों से गुजरती वह पगडंडी गड़हा नाला पार कर हिरनगाँव स्टेशन तक जाती थी। स्टेशन बंबे से बमुश्किल एक मील था।

पगडंडी पर उतरने से पहले कुछ देर पुल पर खड़ा सोचता रहा था, ‘पगडंडी से जाना ठीक होगा या सड़क के रास्ते।खतरा दोनो ही ओर हो सकता था। वहकब कहाँ टकरा जाए, कहना कठिन था। पुल के नीचे बंबा जहाँ विराम लेता था, तीन आदमी फावड़ों से कुचिला मिट्टी इकट्ठा कर रहे थे। पगडंडी से कुछ हटकर बैलगाड़ी खड़ी थी। नहर में पानी नहीं था और सड़ी मछलियों और कूड़े की गंध से नथुने फटने लगे थे। सोचा, उन लोगों से पूछ लेना चाहिए... कोई गया तो नहीं पगडंडी के रास्ते, लेकिन मैं अपने को कमजोर नहीं दिखाना चाहता था। चुप रहा।

Friday, September 16, 2016

खंडित स्वप्न...रूपसिंह चंदेल की कहानी



खंडित स्वप्न
 
कॉलेज में आज भी मीटिंग देर से समाप्त हुई। जब वे घर पहुँची,साढ़े जीन बज रहे थे। दरवाजा खोलते ही नौकरानी पूछ बैठी, ‘बीबीजी,आज फिर देर कर दी...लेकिन उसकी बात का उत्तर दिए बिना उससे जल्दी खाना लगा देने के लिए कहकर बिना कपड़े बदले ही वह बाथरूम चली गयीं और जब बाहर निकलीं, उनके चेहरे से दिन भर की थकान के चिह्न मिट चुके थे।

Sunday, September 11, 2016

हादसा .. रूपसिंह चंदेल की कहानी



रूपसिंह चंदेल की कहानी

हादसा

पर्यावरण के संबंध में उसे इंडिया इंटरनेशनल सेण्टर में वक्तव्य देना था। हारवर्ड विश्वविद्यालय से पर्यावरण प्रबन्धनकी उपाधि लेकर जब एक साल पहले वह स्वदेश लौटा, सरकार के पर्यावरण विभाग ने उसकी सेवाएँ लेने के लिए कई प्रस्ताव भेजे. लेकिन स्वयं कुछ करने के उद्देश्य से उसने सरकारी प्रस्तावों पर उदासीनता दिखाई। वह जानता है कि ऐसी किसी संस्था से बँधने से उसकी स्वतंत्रोन्मुख सोच और विकास बाधित होंगे। वह स्वयं को अपने देश तक ही सीमित नहीं रखना चाहता, बावजूद इसके कि वह अपना सर्वश्रेष्ठ देश के लिए देना चाहता है।

Saturday, September 10, 2016

सड़क की ओर खुलता मकान...रूपसिंह चंदेल की कहानी



रूपसिंह चंदेल की कहानी

सड़क की ओर खुलता मकान

सब कुछ बहुत रहस्यमय था - किसी प्रेत लोक की भाँति... कल्पनातीत। कल्पना में उस मकान में डॉ. यतीश मिश्र का परिवार था। कुछ माह पहले तक उन्हीं के परिवार से सामना हुआ था। वह पुराने बाशिन्दा थे कॉलोनी के। उन्होंने तब मकान बनवा लिया था जब वहाँ इक्का-दुक्का मकान ही थे। कुछ खतरे थे वहाँ रहने के जिस कारण उन्होंने मकान को इतना सुरक्षित बनवाया कि परिन्दा भी अंदर तभी झाँक सके जब डॉ. मिश्र का परिवार चाहे। सौ स्क्वायर गज में चौकोर बना उनका मकान केवल एक ओर ही खुलता था... सड़क की ओर। बीच में आँगन - आंगन के तीन ओर कमरे - किचन और बाथरूम। छत पर आंगन को ढकता घना लोहे का जाल। आसमान में चमकते सूर्य की रौशनी जाल को भेदती हल्की ही आंगन में उतर पाती। मेन गेट पर लोहे का बड़ा गेट था अवश्य लेकिन वह ऊपर तक घनी चादर का बना हुआ था, अत: बाहर से भी नहीं के बराबर रोशनी अंदर दाखिल हो पाती।

Friday, September 9, 2016

दरिंदे ... रूपसिंह चंदेल की कहानी



रूपसिंह चंदेल की कहानी

दरिंदे  

आप भले ही यह सोचें कि यह किसी विश्वविद्यालय के किसी प्रोफेसर की कहानी है, जिसकी अधीनस्थ अधिकारी ने उसके विरुद्ध यौन प्रताड़ना की लिखित शिकायत वाइस चांसलर से लेकर ऐसे मामलों के लिए गठित शिखर समितियों से की; लेकिन वे लंबे समय तक कान में तेल डाले बैठे रहे और प्राफेसर साहब अपने मित्रों और परिचितों से शिकायतकर्ता पर दबाव डलवाते रहे कि वह शिकायत वापस लेकर अपनी नौकरी की रक्षा करे, क्योंकि उसकी नौकरी एडहॉक है।