कामयाब
हमारा घर उनके घर
से सटा हुआ था। दोनों घरों के बीच दीवार थी जिसमें कोई खिड़की नहीं थी। काफी दिन
सियासत में पापड़ बेल कर अब वे विधान परिषद के सदस्य बन गए थे। उनका एक पैर लखनऊ
और एक इलाहाबाद रहता। दोस्ताना तबीयत पाई थी। अगर एक दिन को भी घर आते, हमसे जरूर मिलते। कई बार ऐसा भी हुआ कि दोपहर
में हमारे ही घर पर एक लंबी झपकी मार कर आराम कर लिया।

