नाम में क्या रखा
है
घर के बड़े हॉल
में हम लोग इकट्ठा हो गए थे और खिड़कियों की संधों से हालात का जायज़ा ले रहे थे।
वे बहुत बुरे दिन
थे। मंदिर-मस्जिाद झगड़े को लेकर दंगे की ख़बरें थीं। दूसरे शहरों में
मार-काट-आगजनी की ख़बरें इक्का -दुक्काक, किसी तरह आए अख़बारों से मिल जातीं। इससे इतनी दहशत न होती जितनी रह-रह के शहर
में हो रहे हल्लों-धुओं और पटाखों की तरह चलती गोलियों की आवाज़ों से होती। हम
लोग सहम जाते, चेहरों का रंग
सफ़ेद काग़ज़-सा हो जाता।
