Showing posts with label ओमा शर्मा. Show all posts
Showing posts with label ओमा शर्मा. Show all posts

Monday, October 24, 2016

महत्तम समापवर्त्य ..ओमा शर्मा की कहानी



महत्तम समापवर्त्य

 उनकी हर चीज में नफासत थी।
बोल-चाल में संयत ठहराव। पहनावे में जहीनी चटख और हावभाव में गरिमापूर्ण सादगी। घर की इमारत किसी कलात्मक वास्तुशिल्पी ने बनाई थी। घुमावदार सीढ़ियाँ, पर्याप्त रोशनी, लुभावना रंग-रोगन, जगह की व्यवस्था में आमंत्रित-सा करता खुलापन। मुझे तो पुरोहित साहब, यानी मेरे बॉस ने पहले ही बता दिया था कि मिसेज चाँद ने इंटीरियर डेकोरेशन का कोर्स किया हुआ है। आना पहले उन्हीं को था मगर आखिर वक्त में उन्हें किसी जरूरी काम से जाना पड़ा तो उन्होंने मुझे ठेल दिया... कि जाओ और फलाँ बँगले के इंटीरियर में और क्या किया जा सकता है, इसका मुआयना कर आओ। चटख मोटे परदे, विशिष्ट किस्म की मेज-कुर्सियाँ, मेज पर रखे हुए कुछ स्टैच्यूज... हर कमरे की एक अलग ही सज्जा। घर में घुसने के बाद थोड़ी देर बैठने का मन करे। चीजों को निहारने का मन करे। रही-सही कसर पूरी कर दी साज-सज्जा के अनुरूप रखी दो-तीन पेंटिंग्स ने जो पूरे मकान के सौंदर्य पर चार-चाँद लगा रही थीं।

Friday, October 21, 2016

भविष्यदृष्टा ...ओमा शर्मा की कहानी



भविष्यदृष्टा

" विद्यात्र लिखिता याऽसो ललाटेऽक्षरमालिका।
देवज्ञस्तां पठेदव्यक्तं होशनिर्मल चक्षुषा..."
(सृष्टि रचियता ब्रह्मा ने सब जीवों का नसीब उनके ललाट पर खोद दिया है, कोई पारखी निगाह ज्योतिषी ही उसे पढ़ सकता है)
----सर्वल्ली
जिला भंडारा से खत वहाँ मेरा कौन है कहीं वैष्णो देवी या भभूति बाबा के नाम पर चलाए जा रहे गुमराह अभियान की लंपट पकड़ से निजात पाने के लिए किसी 'एक और' मासूम शिकार ने तो नहीं लिखा। दाम और दंड की कनफोड़ डुगडुगी बजाती हुई एक चिट्ठी तो हर महीने आ ही जाती है।

Tuesday, October 18, 2016

जनम ..ओमा शर्मा की कहानी



जनम

 वे सुनाते जा रहे थे।
और हम सब टकटकी लगाकर सुने जा रहे थे - गोया बचपन की राजा-रानी को कहानी में राजकुमार तमाम पहरेदारों को चकमा देकर राजकुमारी के कक्ष तक जा पहुँचा हो, किवाड़ पर 'धप्प' करने ही वाला हो की दरबानों के पदचापों का हमला।
क्या करेगा अब राजकुमार?

Saturday, October 15, 2016

दुश्मन मेमना..ओमा शर्मा की कहानी



दुश्मन मेमना


वह पूरे इत्मीनान से सोई पड़ी है। बगल में दबोचे सॉफ्ट तकिए पर सिर बेढंगा पड़ा है। आसमान की तरफ किए अधखुले मुँह से आगे वाले दाँतों की कतार झलक रही हैं। होंठ कुछ पपड़ा से गए हैं,साँस का कोई पता ठिकाना नहीं है। शरीर किसी खरगोश के बच्चे की तरह मासूमियत से निर्जीव पड़ा है। मुड़ी-तुड़ी चादर का दो तिहाई हिस्सा बिस्तर से नीचे लटका पड़ा है। सुबह के साढ़े ग्यारह बज रहे हैं। हर छुट्टी के दिन की तरह वह यूँ सोई पड़ी है जैसे उठना ही न हो। एक-दो बार मैंने दुलार से उसे ठेला भी है... समीरा, बेटा समीरा, चलो उठो... ब्रेक फास्ट इज रेडी...। मगर उसके कानों पर जूँ नहीं रेंगी है। उसके मुड़े हुए घुटनों के दूसरी तरफ खुली त्रिकोणीय खाड़ी में किसी ठग की तरह अलसाए पड़े कास्पर (पग) ने जरूर आँखें खोली हैं मगर कुछ बेशर्मी उस पर भी चढ़ आई है। बिगाड़ा भी उसी का है।

Friday, October 14, 2016

कंडोलेंस विजिट .. ओमा शर्मा की कहानी



कंडोलेंस विजिट

 वे उसे दफ्तर के गलियारे में ही मिल गए। एक तरह से अच्छा ही हुआ। कमरे में या तो उनके टेलीफोन ही इतनी आवृत्ति से बजते थे कि बातचीत में विघ्न चिड़चिड़ा डालता था या कोई न कोई विजिटर दखल देता रहता था। वह उनके कमरे की तरफ बढ़ अवश्य रहा था, लेकिन अनुभव की आड़ में अंतर्तम में एक विकर्षण का भाव भी जाग रहा था। पहले उसने उनके घर जाकर ही बताने की सोची थी, लेकिन अपनी मनःस्थिति के भटकाव में वह टलता गया। अब थोड़ा समय भी निकल गया था। शायद अपेक्षाकृत पर्याप्त। आखिर निगम साहब उसके इतने नजदीकी परिचितों-दोस्तों में शुमार होते हैं। क्या हुआ जो इतने वरिष्ठ अफसर हैं। कभी भी अपनी हैसियत का अहसास उसके सामने नहीं होने देते हैं। विभाग के बड़े अफसरों की मतलबपरस्ती और शातिराना रवैए की जानकारी उसे खूब है, लेकिन मानना पड़ेगा भाई, अपवाद हर जगह होते हैं। आदमी को उसकी उम्र, पद या प्रतिष्ठा से अलग रखकर, महज एक इंसान के बतौर देखनेवाले चाहे विरले ही सही, होते हैं।
निगम साहब ने ही पहल की थी। देखते ही, 'अरे सोनकर भाई कैसे हो?'